लद्दाख हिंसा: केंद्र ने सोनम वांगचुक को ठहराया जिम्मेदार, अरब स्प्रिंग और नेपाल Gen Z आंदोलन का हवाला

लद्दाख में हाल ही में हुई हिंसा ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। लंबे समय से स्थानीय संगठनों और युवाओं की तरफ से संवैधानिक गारंटी, छठी अनुसूची और पर्यावरणीय सुरक्षा की मांग की जा रही थी

लेह के NDS मेमोरियल ग्राउंड में हजारों की संख्या में युवा इकट्ठा हुए, जहां आंदोलन ने अचानक उग्र रूप ले लिया। शुरुआत में यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था लेकिन जल्द ही भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया और नारेबाजी के बीच बीजेपी के दफ्तर और हिल काउंसिल की ओर कूच कर गया। वहां पथराव हुआ और हालात इतने बिगड़े कि बीजेपी दफ्तर में आगजनी तक कर दी गई।

केंद्र सरकार का कहना है कि स्थिति पूरी तरह से काबू से बाहर हो चुकी थी। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस और सुरक्षाबलों पर हमला किया और आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इस गोलीबारी में कुछ लोगों की मौत हुई है जबकि कई घायल भी बताए जा रहे हैं। लेह और उसके आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं ताकि अफवाहों का प्रसार न हो सके।

गृह मंत्रालय ने इस पूरी हिंसा के लिए पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया है। मंत्रालय का आरोप है कि वांगचुक ने अपने बयानों और भाषणों में युवाओं को भड़काया और उन्हें वैश्विक आंदोलनों का उदाहरण देकर प्रेरित किया। आरोप है कि उन्होंने अरब देशों के स्प्रिंग मूवमेंट, नेपाल के Gen Z प्रोटेस्ट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई रंग क्रांतियों का जिक्र करते हुए लद्दाख के युवाओं से संघर्ष तेज करने को कहा। सरकार का मानना है कि इन विचारों ने प्रदर्शनकारियों के बीच असंतोष को भड़काकर उसे हिंसा का रूप दे दिया।

हालांकि वांगचुक के करीबी सहयोगियों का कहना है कि उन्होंने हमेशा अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से संघर्ष करने की अपील की है। उनका लंबे समय से कहना रहा है कि लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक परियोजनाओं और खनन गतिविधियों पर रोक जरूरी है। वे यह भी चेतावनी देते रहे हैं कि यदि बाहरी कंपनियों और उद्योगपतियों को खुली छूट दी गई तो लद्दाख के संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार खत्म हो जाएगा और इससे यहां के समाज और पर्यावरण को गंभीर खतरा होगा।

हिंसा के बाद अब लद्दाख की राजनीति और ज्यादा अस्थिर हो गई है। बीजेपी के दफ्तर पर हमला यह दिखाता है कि लोगों के भीतर गहरी नाराजगी है। विपक्षी दल और स्थानीय संगठन लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार लद्दाख की जनता की आवाज को दबा रही है और उनकी वास्तविक चिंताओं को नजरअंदाज कर रही है। वहीं, अब जब मामला हिंसक हो चुका है, तो सरकार पर और भी दबाव बढ़ गया है कि वह कठोर कदम उठाए।

लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। उस समय से यहां छठी अनुसूची और संवैधानिक गारंटी की मांग लगातार उठ रही है। लोग चाहते हैं कि उनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी दबाव न पड़े और स्थानीय संस्कृति तथा पहचान सुरक्षित रहे। मगर केंद्र सरकार इन मांगों पर अब तक ठोस कदम नहीं उठा सकी है। इसीलिए असंतोष लगातार बढ़ रहा था और आखिरकार वह हिंसा में बदल गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि केवल सुरक्षा बलों की सख्ती से समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि सरकार वास्तव में शांति चाहती है, तो उसे संवाद और भरोसा कायम करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। सोनम वांगचुक पर लगाए गए आरोपों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि उनका नाम लद्दाख में सम्मान और संघर्ष दोनों से जुड़ा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार सख्त रवैया अपनाती है या फिर बातचीत और सहमति के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश करती है।

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